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Republic Day Special: बिस्मिल को मारने पहुंची भीड़ के सामने जब खड़े हो गए थे अशफाक, जानें पूरा किस्सा


देश की आजादी के लिए शहीद हुए राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खां की शहादत आज भी सबसे जेहन में है। आजादी के इन दीवानों ने हंसते हंसते मौत को गले लगा लिया था। शायराना मिजाज में आजादी हासिल करने का जुनून दोनों में एक जैसा था, शायद यही वजह थी कि जब पहली मुलाकात के बाद दोस्ती की जो शुरूआत हुई वो मरते दम तक भी उसी शिद्दत से जारी रही। दुनिया भले ही एक को हिंदू और दूसरे को मुस्लिम कहती हो लेकिन वो दोनों दो जिस्म एक जान थे। उनकी दोस्ती के कई किस्से भी मशहूर हैं, लेकिन एक वाकया ऐसा भी है जिसे जानकर कोई भी उनकी दोस्ती पर नाज कर सकता है।

शायरी से हुई थी पहली मुलाकात

राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह की मुलाकात भी बेहद दिलचस्प वाकये के साथ हुई थी। अशफाक के बड़े भाई रियासतउल्लाह बिस्मिल के सहपाठी थे। उनके मुंह से बिस्मिल की लगातार तारीफें सुनने और उनका शायराना अंदाज की जानकारी लगने के बाद से ही अशफाक की बिस्मिल से मिलने की चाहत हिलोरे खा रही थी। कई कोशिशों के बाद भी जब बात नहीं बनी तो एक बार अशफाक खन्नौत नदी के किनारे सुनसान इलाके में बिस्मिल की बैठक में ही पहुंच गए। इस दौरान बिस्मिल की एक शायरी पर आमीन कहने पर उनकी नजर इस नए लड़के पर पड़ी। उनकी शायरी का अपने शायराना अंदाज में जवाब देने वाले अशफाक के साथ बाद में उनकी ऐसी घुटने लगी कि आगे चलकर दोनों की दोस्ती के किस्से भी चर्चा में रहे।

जब भीड़ के सामने दीवार बने अशफाक

राम प्रसाद बिस्मिल अशफाकुल्लाह को अपना छोटा भाई मानते थे। उसी तरह अशफाक भी उन्हें बड़े भाई का ही दर्जा देते थे। आमतौर पर दोनों की मुलाकात आर्यसमाज के मंदिर में होती थी। अशफाक के आर्यसमाज मंदिर जाने पर उनके परिवार को आपत्ति थी, हालांकि अशफाक अपनी जान से प्यारे भाई से मिलने के लिए वहां जाने से कैसे रुकने वाले थे। ये सिलसिला लंबे वक्त तक चलता रहा।

बताते हैं कि एक बार मुस्लिम समाज से जुड़ दर्जनों लोग आर्यसमाज के मंदिर में रामप्रसाद बिस्मिल को मारने पहुंच गए थे क्योंकि उन्हें लगता था कि बिस्मिल ने अशफाक को बरगलाया है। जब यह घटना हुई उस वक्त अशफाक भी वहां मौजूद थे। उन्हें जब इसका पता लगा तो वह मंदिर के मुख्य द्वार पर किसी दीवार की तरह खड़े हो गए। काफी मजबूत कदकाठी के अशफाक को देखकर भीड़ बाहर ही ठिठक गई। इस दौरान उन्होंने कहा कि बिस्मिल को हाथ लगाने से पहले सभी को पहले उनसे निपटना होगा। अशफाक के तीखे तेवरों को देखते हुए भीड़ को दोबारा लौटने को मजबूर होना पड़ा था।

गौरतलब है कि आजादी के इन दीवानों ने काकोरी कांड को साथ मिलकर अंजाम दिया था। इस कांड ने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी थी। इसके बाद देशभर में क्रांति की एक अलख जग गई थी। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खां को 19 दिसंबर 1927 को महज काकोरी कांड सहित अन्य मामलों में दोषी मानते हुए ब्रिटिश हुकुमत ने फांसी दे दी थी। दोनों वीर शहीद हंसते हंसते फांसी पर चढ़ गए और देश को आजादी का मतलब सिखा गए।

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