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Birthday Special : फिल्म देखने पर पिटने वाला लड़का जो बाद में बना सुपरस्टार


नई दिल्ली. सिनेमा इंडस्ट्री में ऐसे महान कलाकारों की कमी नहीं रही जिन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए परिवार और समाज से ताने सुने हों. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी सिनेमा के शुरुआती सुपरस्टार्स में शामिल भारत भूषण ने तो फिल्म देखने पर अपने पिता से मार तक खाई थी. जी हां! भारत भूषण जो बैजू बावरा, मिर्जा गालिब, सोनी महिवाल और तानसेन जैसी फिल्मों के गीतों से आज तक लोगों के दिलों में जिंदा हैं, उन्होंने अपने पिता से खिलाफत करके ही एक्टिंग और संगीत की दुनिया में कदम रखा था.

भारत भूषण ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता आर्य समाजी थे. जिसके कारण उन्हें बच्चों का फिल्में देखना कतई पसंद नहीं था. एक बार पिता के किसी काम के सिलसिले में बाहर जाने पर भारत भूषण दोस्तों के साथ फिल्म देखने चले गए थे. लेकिन वह फिल्म देख के वापस नहीं आ पाए और उनके पिता घर आ चुके थे. यह जानने के बाद कि भारत फिल्म देखकर आ रहे हैं. उनके पिता ने उनकी खूब पिटाई की थी.

बस जैसे इस पिटाई ने भारत के मन में इसी क्षेत्र में नाम कमाने की जिद पैदा कर दी और भारत ने अपने पिता का घर छोड़ दिया. लेकिन ऐसा नहीं कि उन्हें आसानी से सफलता मिल गई, अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्जा गालिब जैसे चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता भारत भूषण का सितारा भी कभी इतनी गर्दिश में पड़ गया था कि उन्हें अपना गुजारा चलाने के लिए काफी हल्के दर्जे की फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं करने को मजबूर होना पड़ा था.

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 1920 में जन्मे भारत भूषण संगीत की शिक्षा लेकर मुंबई की फ़िल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फ़िल्म ‘चित्रलेखा’ में एक छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी. 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी खास पहचान नहीं बन पाई. कई फिल्मों के बाद भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फ़िल्म ‘बैजू बावरा’ से चमका.

वहीं भारत भूषण के फ़िल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ का भी अहम स्थान है. इस फ़िल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्जा गालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि गालिब ही परदे पर उतर आए हों. बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

लेकिन वक्त गुजरने पर यह स्टारडम भी साथ छोड़ गया. जिसके बाद छोटे पर्दे के शुरुआती दौर में भारत भूषण टीवी पर भी नजर आए. हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णिम युग के इस अभिनेता ने आखिरकार 27 जनवरी 1992 को 72 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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